आधुनिक हिंदी साहित्य में प्रतिबिंबित ‘भारतीय ज्ञान परंपरा’ और उसकी वर्तमान प्रासंगिकता
Abstract
भारतीय ज्ञान परंपरा किसी एक ग्रंथ, धर्म, दर्शन अथवा ऐतिहासिक काल तक सीमित अवधारणा नहीं है। इसका निर्माण वैदिक, उपनिषदिक, बौद्ध, जैन, लोकायत, भक्ति, सूफी, लोक, आदिवासी और आधुनिक वैज्ञानिक-मानवतावादी विचारधाराओं के दीर्घकालीन संवाद से हुआ है। आधुनिक हिंदी साहित्य ने इस बहुआयामी ज्ञान-परंपरा को केवल संरक्षित ही नहीं किया, बल्कि उसका पुनर्पाठ, परीक्षण और पुनर्सृजन भी किया है। भारतेंदु हरिश्चंद्र के राष्ट्रीय-सामाजिक जागरण से लेकर प्रेमचंद के लोकजीवन, जयशंकर प्रसाद के दार्शनिक चिंतन, निराला के विद्रोही मानवतावाद, महादेवी वर्मा की करुणा, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ के मिथकीय पुनर्पाठ, फणीश्वरनाथ रेणु की आंचलिक चेतना, अज्ञेय और मुक्तिबोध के आत्मसंघर्ष तथा दलित, स्त्री एवं आदिवासी लेखन तक भारतीय ज्ञान परंपरा अनेक रूपों में अभिव्यक्त हुई है।प्रस्तुत शोध-लेख गुणात्मक और व्याख्यात्मक पद्धति पर आधारित है। इसमें आधुनिक हिंदी साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियों और चयनित रचनाओं का पाठ-विश्लेषण करते हुए यह समझने का प्रयास किया गया है कि भारतीय ज्ञान परंपरा साहित्य में किन मूल्यों, विचारों और जीवन-दृष्टियों के रूप में प्रकट होती है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि आधुनिक हिंदी साहित्य ने परंपरा को जड़ और अपरिवर्तनीय व्यवस्था के रूप में स्वीकार नहीं किया। उसने लोकमंगल, करुणा, सह-अस्तित्व, प्रकृति-सम्मान, सत्य, न्याय, कर्म, आत्मसंघर्ष और सामुदायिकता जैसे मूल्यों को ग्रहण करते हुए जाति, लैंगिक असमानता, अंधविश्वास, कर्मकांड और सामाजिक वर्चस्व की आलोचना भी की। वर्तमान समय में पर्यावरणीय संकट, सामाजिक विखंडन, उपभोक्तावाद, सांप्रदायिक तनाव, मूल्यहीनता और शिक्षा के औपनिवेशिक प्रभाव के संदर्भ में इस साहित्यिक ज्ञान-संपदा का महत्त्व और बढ़ जाता है। लेख का निष्कर्ष है कि भारतीय ज्ञान परंपरा की सार्थकता उसके गौरवगान में नहीं, बल्कि उसके विवेकपूर्ण, समावेशी और समकालीन पुनर्पाठ में निहित है।
मुख्य शब्द: भारतीय ज्ञान परंपरा, आधुनिक हिंदी साहित्य, लोकज्ञान, सांस्कृतिक चेतना, मानवतावाद, सामाजिक न्याय, पर्यावरणीय दृष्टि।