माघ मेला: आस्था, सत्ता और राजनीति का संगम

Authors

  • शुभी शुक्ला सहायक आचार्य,राजनीति विज्ञान विभाग, मदनमोहन मालवीय स्नाकोत्तर महाविद्यालय कालाकांकर प्रतापगढ़ Author

Abstract

माघ मेले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का आधार मात्र धार्मिक था परंतु यदि वर्तमान में  माघ मेले की स्थिति को देखा जाए तब पता चलता है कि वास्तविक स्थिति अब धार्मिक न होकर राजनीतिक हो चुकी। वर्तमान सत्ता इसे आध्यात्मिक पर्व न समझकर राजनीतिक पर्व समझती है , आज माघ मेले को सत्ता प्राप्त करने का ऐसा मंच मान  लिया गया है कि यदि माघ मेले की व्यवस्था को भली प्रकार से सुनिश्चित नहीं किया गया तो उनकी राजनीति स्थिति पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता हैं “इसी संदर्भ  में राहुल मेहरोत्रा ने लिखा है कि माघ मेला एक अस्थाई नगर है जहां राज्य का शासन, क्षमता, जनसमूह  नियंत्रण, संसाधन प्रबंधन आदि का प्रदर्शन करता है जहां राजनीति दल अपने प्रचार प्रसार तथा सत्ता की प्राप्ति के लिए प्रयासरत रहते हैं”1

इस प्रकार माघ मेला भारतीय राजनीति का एक ऐसा अप्रत्यक्ष मंच बनकर सामने आ रहा जिसके माध्यम से प्रत्येक राजनीति दल सत्ता प्राप्ति का प्रयास करते है। अतः यह शोध पत्र इसी आस्था सत्ता और राजनीति के संगम को समझने के उद्देश्य से किया गया ताकि यह स्पष्ट रूप से समझा जा सके कि कैसे एक धार्मिक आयोजन भारतीय लोकतंत्र में राजनीतिक आयोजन बनकर सामने आ रहा है

मुख्य शब्द:  धार्मिक आयोजन, जनसमूह, सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक प्रतीक, राजनीतिक मंच, जनमत निर्माण, प्रचार प्रसार आदि शब्दों का प्रयोग इस शोध पत्र में मुख्य रूप से किया जाएगा

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Published

2026-07-25

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माघ मेला: आस्था, सत्ता और राजनीति का संगम. (2026). Kalakankar International Journal of Multidisciplanary Research, 1(1), 27-30. https://kijmr.com/index.php/kijmr/article/view/4